दोस्तों आज हम किस आर्टिकल में आपको मैं बताऊंगा कि भारतीय संविधान की परिभाषा और प्रकृति क्या है उसके बारे में पूरा स्पष्ट रूप से आपको यहां पर इस आर्टिकल में बताऊंगा तो आप इस आर्टिकल को पूरा पढ़िए और मैंने यूट्यूब पर भी इसके बारे में वीडियो बना दी है जो कि मैं आपको नीचे आर्टिकल में वीडियो Ka Link दे दूंगा तो वहां पर डायरेक्टली क्लिक करके इस वीडियो को देख सकते हैं

 भारतीय संविधान की परिभाषा एवं प्रकृति , संविधान के प्रकार || Bhartiya Samvidhan Ki Prakiti Our Paribhasha, Parkar 
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भारतीय संविधान की परिभाषा एवं प्रकृति

किसी भी देश के संविधान से मुख्यतया 4 बातों का पता चलता है –

(1)- उस देश की सरकार के कौन-कौन से प्रमुख अंग है |

(2)- इन अंगों की संरचना, कार्य एवं शक्तियां क्या हैं |

(3)- इन अंगों के आपस में सम्बन्ध क्या हैं |

(4)- इन अंगों का वहां की जनता से क्या सम्बन्ध है |

भारतीय संविधान की प्रकृति – किसी भी देश का संविधान वहां का सर्वोच्च कानून होता है | संविधानिक विधि ही सर्वोच्च एवं सर्वोपरि होती है | अन्य सभी विधियां अपनी विधि-मान्यता, संविधानिक विधि से ही प्राप्त करती हैं

 | दूसरे शब्दों में ; यदि एक साधारण विधि एवं संविधानिक विधि में टकराव हो तो संविधानिक विधि को प्रधानता दी जायेगी |

कहने का तात्पर्य यह है कि, यदि साधारण विधि का कोई प्रावधान, संविधानिक विधि के किसी प्रावधान के प्रतिकूल है, तो उस दशा में साधारण विधि का वह प्रावधान, प्रतिकूलता की सीमा अथवा असंवैधानिकता की सीमा तक शून्य होगा|

संविधान के प्रकार – संविधान मुख्यतः 4 प्रकार के हैं, जो निम्नलिखित हैं –

(1) लिखित अथवा अलिखित संविधान (लिखित संविधान जो बनाया जाता है अर्थात अधिनियमित किया जाता है तथा अलिखित संविधान जो अधिनियमित नही होता है |)

(2) नम्य एवं अनम्य संविधान

(3) संविधान, जो संसदात्मक शासन प्रणाली स्थापित करे अथवा समाज में अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली स्थापित करे |


संसदात्मक शासन प्रणाली के दो प्रमुख लक्षण होते हैं

(a)- वास्तविक कार्यपालिका विधायिका का अंग होती है |

(b)- वास्तविक कार्यपालिका विधायिका के निचले सदन के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है |
उदाहरण के लिए – भारत एवं ब्रिटेन की शासन व्यवस्था भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75(5) के अनुसार, मंत्रिपरिषद् का प्रत्येक सदस्य या तो लोकसभा का अथवा राज्यसभा का सदस्य होगा अथवा उसकी नियुक्ति के 6 माह के भीतर लोकसभा अथवा राज्यसभा का सदस्य होना पड़ेगा |

हम जानते हैं कि मंत्रिपरिषद् ही वास्तविक कार्यपालिका है तथा अनुच्छेद 75(5) के अंतर्गत इसके प्रत्येक सदस्य को लोक अथवा राज्यसभा का सदस्य होना अनिवार्य है | लोकसभा तथा राज्यसभा दोनों मिलकर केन्द्रीय विधायिका का निर्माण करते हैं अतः स्पष्ट है कि केंद्रीय विधायिका का अंग वास्तविक कार्यपालिका मंत्रिपरिषद् है |


इसी प्रकार से अनुच्छेद 75(3) में की गयी व्यवस्था के अनुसार केन्द्रीय मंत्रिपरिषद् लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होता है जो कि संसदात्मक शासन प्रणाली का दूसरा लक्षण है |

संसदात्मक शासन प्रणाली के विपरीत अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के अंतर्गत कार्यपालिका विधायिका का अंग नही होती है | बल्कि इससे पूर्णतः स्वतंत्र होती है | 

उदाहरण के लिए – अमेरिकन राष्ट्रपति प्रणाली | अमेरिका के न तो राष्ट्रपति अथवा उसके सचिव अमेरिकन कांग्रेस के सदस्य होते हैं तथा न ही वे कांग्रेस के किसी सदन के प्रति उत्तरदायी होते हैं |

संविधान या तो संघात्मक हो सकता है अथवा एकात्मक -

संघात्मक संविधान के लक्षण –

(1)- किसी भी संघात्मक संविधान के अंतर्गत दो प्रकार की सरकारें कार्य करती हैं, केन्द्रीय सरकार तथा प्रांतीय सरकार |

(2)- केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का बंटवारा होता है |

(3)- इस प्रकार का बंटवारा जो कि लिखित होता है अर्थात् संघात्मक संविधान लिखित होता है |

(4)- संघात्मक संविधान अथवा संघवाद के अंतर्गत एक स्वतंत्र न्यायपालिका होती है |

(5)- न्यायालयों को अधिकार मिलता है |

(6)- संघात्मक संविधान हमेशा कठोर होता है | (चूँकि संतुलन राज्य एवं केंद्र के बीच होता है इसलिए कठोर होता है)

भारतीय संविधान की प्रकृति –

संघात्मक अथवा एकात्मक – यदि संघात्मक संविधान के उपरोक्त सभी लक्षणों को ध्यान में देखा जाए तो कहा जा सकता है कि भारतीय संविधान प्रथम दृष्ट्या संघात्मक संविधान है | क्योंकि केन्द्रीय एवं राज्य सरकारें एक साथ कार्यरत रहती हैं | सातवें परिशिष्ट में तीन अनुसूचियों के माध्यम से शक्तियों का बंटवारा किया गया है | संविधान लिखित है, अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान के संशोधन की प्रक्रिया जटिल है | स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था की गयी है तथा न्यायालयों को प्राधिकार दिया गया है |

परन्तु संघात्मक संविधान के उपरोक्त सभी लक्षणों को भारतीय संविधान में विद्यमान रहने के बावजूद भी यह आक्षेप लगाया जाता है कि संविधान कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में प्रबल एकात्मक प्रवृत्ति दर्शाने लगता है और उन परिस्थितयों में राज्यों की शक्तियां सिमट कर केंद्र में निहित हो जाती हैं | अर्थात्, केंद्र राज्यों पर हावी हो जाता है | ऐसे आक्षेप के निम्नलिखित आधार हैं –


1. अनुच्छेद 249 के अंतर्गत –

 अनुच्छेद 249 में की गयी व्यवस्था के अनुसार यदि राज्यसभा उपस्थित एवं मतदान कर रहे सदस्यों के 2/3 के बहुमत से यह प्रस्ताव पारित करता है कि यह राष्ट्रहित में है कि संसद राज्यसूची में उल्लिखित विषयवस्तु के सन्दर्भ में कानून बनाये तो उस दशा में संसद राज्यसूची में उल्लिखित विषयवस्तु के सन्दर्भ में कानून बनाने के लिए प्राधिकृत हो जाता है |

2. आपात स्थिति के दशा में संसद –

(a)- राज्यसूची में उल्लिखित विषय-वस्तुओं के सन्दर्भ में कानून बना सकती है,

(b)- संसद, राज्यों को इस सन्दर्भ में निर्देश दे सकती है कि वे कार्यपालिका शक्तियों का प्रयोग किस प्रकार करेंगे,

(c)- संघीय अधिकारियों को, राज्यसूची में उल्लिखित मामलों को क्रियान्वित करने के लिए प्राधिकृत कर सकती है,  तथा

(d)- संविधान के वित्तीय प्रावधानों को स्थगित कर सकती है | (अनुच्छेद 352, 353, 354, 358, 359)


इन परिस्थितियों में यह आक्षेप लगाया जाता है कि केंद्र राज्यों के ऊपर हावी हो जाता है तथा संविधान एकात्मक प्रवृत्ति दर्शाने लगता है | (अनुच्छेद 356 के अंतर्गत)

3. यदि राष्ट्रपति जो कि संघ कार्यपालिका का प्रधान होता है, को इस बात का समाधान हो जाए कि किसी राज्य की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुरूप नही चलाई जा सकती है तो वह इस आशय का उद्घोषणा कर सकता है (अनुच्छेद 356) और उस परिस्थिति में वह राज्य सरकार की समस्त शक्तियों को अपने में निहित कर सकता है | यहाँ तक कि राज्यपालों की शक्तियों को भी |

 अपवाद स्वरूप वह उच्च न्यायालय की शक्तियों को अपने में निहित नही कर सकता है | राष्ट्रपति संसद को भी इस बात के लिए, ऐसी परिस्थितियों में प्राधिकृत कर सकता है कि संसद राज्यसूची में उल्लिखित विषय-वस्तुओं के सन्दर्भ में कानून बनाये परिणाम यह होगा कि अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन की दशा में राज्य की कार्यपालिका एवं विधायिका शक्तियां राष्ट्रपति में निहित हो जाती है | जिसके आधार पर यह आक्षेप लगाया जाता है कि संविधान एकात्मक प्रवृत्ति दर्शाता है |

4. वित्तीय आपात स्थिति की दशा में (अनुच्छेद 360) – संघ एवं राज्यों को यह निर्देश दिया जा सकता है कि उनके सेवकों के के वेतन, भत्ते इत्यादि में कटौती की जाए |

5. ऐसा आक्षेप लगाया जाता है की अनुच्छेद 256 तथा अनुच्छेद 257 के अंतर्गत केन्द्रीय सरकार राज्यों को प्रशासकीय निर्देश दे सकता है, जिन निर्देशों को मनवाने का तरीका भी संविधान में बताया गया है और उन अनुच्छेदों के अंतर्गत केंद्र राज्य पर हावी हो जाता है |

6. अनुच्छेद 3 के अंतर्गत संसद एकपक्षीय क्रिया के द्वारा राज्यों के क्षेत्रों को कम या अधिक कर सकता है | ऐसा करने में राज्यों की सहमती नही ली जाती है | अतः यह आक्षेप लगाया जाता है कि अनुच्छेद 3 के अंतर्गत केंद्र राज्यों पर हावी हो जाता है |

7. राज्य विधायिकाओं के द्वारा पारित कानूनों को कुछ परिस्थितियों में राष्ट्रपति के विचार-विमर्श के लिए राज्यपाल द्वारा रोक लिया जाता है | (अनुच्छेद 201, 288(2) और 204)

8. राज्य कार्यपालिका प्रधान राज्यपालों की नियुक्ति राष्ट्रपति (केन्द्रीय कार्यपालिका प्रधान) द्वारा की जाती है तथा ये राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त तक अपने पद पर बने रहते हैं |


इस प्रकार से ऐसा आरोप लगाया जाता है कि उपरोक्त परिस्थितियों में संविधान संघात्मक न रहकर प्रबल एकात्मक प्रवृत्ति दर्शाने लगता है |
परन्तु यदि संविधानिक प्रावधानों का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाए तो यह निष्कर्ष निकलता है कि संविधान एक विशेष प्रकार के संघवाद को प्रदर्शित करता है | जिसे सहकारी संघवाद की संज्ञा दी जा सकती है | जिसके अंतर्गत केंद्र एवं राज्य एक-दूसरे के प्रतिद्वंदी के रूप में नही बल्कि एक-दूसरे के सहयोगी के रूप में कार्य करते हैं |


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