शून्य और शून्यकरणीय संविदा | Voidable contract in hindi

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शून्यकरणीय संविदा – भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2 (झ) शून्यकरणीय संविदा को परिभाषित करती है इसके अनुसार –
” वह करार जो उसके पक्षकारो में से एक या अधिक के विकल्प पर तो प्रवर्तनीय हो परन्तु अन्य पक्षकार या पक्षकारो के विकल्प पर नहीं , शून्यकरणीय संविदा है .”
जिस पक्षकार को संविदा स्वीकार या अस्वीकार कराने का विकल्प प्राप्त रहता है , यदि वह संविदा को अस्वीकार कर देता है तो संविदा शुन्य हो जाती है परन्तु यदि उसने संविदा को स्वीकार कर लिया तो संविदा पुर्णतः विधमान हो जाती है और दोनों पक्षकारो को बाध्यकारी होती है .
संविदा अस्वीकार करने वाले व्यक्ति या पक्षकार को युक्तियुक्त समय के भीतर संविदा अस्वीकार करना चाहिए . यदि संविदा रद्द करने से पूर्व किसी तृतीय व्यक्ति को संविदा की विषयवस्तु में अधिकार प्राप्त हो जाता है जिसे तृतीय पक्षकार ने सदभावपूर्वक प्रतिफल देकर प्राप्त किया है तो ऐसी स्थिति में संविदा रद्द नहीं की जा सकती .
उदाहरण – A,B के कपट के कारण B को अपना घोडा बेचता है ,इससे पहले की C को कपट का ज्ञान हो तथा वह संविदा को रद्द करे , B उस घोड़े को C को बेच देता है ,जिसने सदभाव पूर्वक मूल्य देकर प्राप्त किया है C को अच्छा हक़ प्राप्त होगा तथा वह A को घोडा वापस करने के लिए बाध्य नहीं होगा .
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शून्यकरणीय संविदा के रद्द होने का परिणाम

शून्यकरणीय संविदा के रद्द कर दिए जाने के परिणाम का उल्लेख अधिनियम की धारा 64 में मिलता है इसके अनुसार जब कोई व्यक्ति जिसके विकल्प पर संविदा शून्यकरणीय है संविदा को विखंडित कर देता है , तो दुसरे के पक्षकार के लिए या ह आवश्यक नहीं होता की वह संविदा को पूरा करे . इसके साथ ही इसी धारा में यह भी उपबंध है की संविदा को विखंडित करने वाले पक्षकार ने यदि दुसरे पक्षकार से संविदा के अंतर्गत कोई लाभ प्राप्त किया है तो ऐसा लाभ उसे वापस करना होगा .

शून्य संविदा – भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2 (ञ) शून्य संविदा को परिभाषित करती है इसके अनुसार –
” जो संविदा विधि द्वारा प्रवर्तनीय नहीं रह जाती है वह तब शून्य हो जाती है जब वह विधि द्वारा प्रवर्तनीय नहीं रह जाती है .”
भारतीय संविदा अधिनियम में बहुत से ऐसे करार है जो नैतिकता या लोकनीति के विरुद्ध होने के कारण शून्य किये गये हैं . कुछ संविदाएं सृजन के समय ही शून्य हो जाती हैं . जबकि कुछ संविदाएं सृजन के समय तो विधमान रहती हैं , परन्तु बाद में किन्ही कारणों से उनका पालन असंभव हो जाने के कारण वे शून्य हो जाती हैं .

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शून्य संविदा के परिणाम 

जब संविदा शून्य हो जाती है तो प्रभावरहित हो जाती है और पक्षकारो के अधिकार एवं दायित्व भी समाप्त हो जाते हैं . अतः संविदा के किसी पक्षकार के द्वारा इसे प्रवर्तनीय नहीं किया जा सकता .(धारा – 65)

शून्यकरणीय संविदा और शून्य संविदा में अंतर

१ –  प्रवर्तन की दृष्टी से – शून्यकरणीय संविदा किसी एक के विकल्प पर प्रवर्तनीय होती है , जबकि शून्य संविदा किसी भी पक्षकार द्वारा प्रवर्तित नहीं कराइ जा सकती .
२ – विधिक महत्त्व की दृष्टी से – शून्यकरणीय संविदा तब तक विधमान्य होती है जब तक पक्षकारो के द्वारा विखंडित नहीं कर दी जाती . जबकि शून्य संविदा प्रभावरहित होती है . इसका कोई विधिक महत्त्व नहीं होता .
३ – साक्ष्य की आवश्यकता की दृष्टी से – शून्यकरणीय संविदा सामान्य तौर पर मान्य संविदा होती है उसको रद्द करने के लिए पक्षकारो को यह साबित करना पड़ता है की वह किस आधार पर संविदा को रद्द कर रहा है . जबकि शून्य संविदा सामान्य तौर पर शून्य ही होती है और उसको निरस्त करने के लिए किसी साक्ष्य की आवश्यकता नहीं पड़ती .
४ – तृतीय व्यक्ति का हक़  –  शून्यकरणीय संविदा रद्द होने से पूर्व तृतीय व्यक्ति द्वारा सदभावपूर्वक संविदा में हक़ प्राप्त कर सकता है . जबकि शून्य संविदा में किसी तृतीय व्यक्ति को कोई हक़ नहीं होता है .