बिना वारण्ट गिरफ्तारी कैसे होती है- जमानत क्या होती है

 

यदि पुलिस किसी व्यक्ति को बिना वारण्ट के गिरफ्तार करती है, तो उसे गिरफ्तार करते ही गिरफ्तारी का कारण बताना होगा। अगर गिरफ्तार व्यक्ति जमानत कराने का हकदार है, तो उसे उसके अधिकार की सूचना दे देनी चाहिए और अपने जमानतियों की व्यवस्था करने का अवसर देना चाहिए।

बन्दी बनाया गया व्यक्ति तत्काल प्रभाव से अपने लिए एक वकील नियुक्त कर सकता है। वह वकील व्यक्ति से पूछताछ के दौरान वहाँ उपस्थित रह सकता है। अगर गिरफ्तारी गैर-जमानती अपराध के तहत हुई है, तो गिरफ्तार व्यक्ति किसी भी समय मजिस्ट्रेट के सामने जमानत याचिका भेज सकता है । 

बिना वारण्ट के गिरफ्तार किए गए किसी व्यक्ति को पुलिस 24 घण्टों से ज्यादा समय तक अपनी हिरासत में नहीं रख सकती। अगर ऐसा लगे कि जांच-पड़ताल चौबीस घण्टे में पूरी नहीं हो सकती, तो जाँच करने वाला अधिकारी मुकदमें के कागजात के साथ गिरफ्तारशुदा व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करेगा।

अगर मजिस्ट्रेट जरूरी समझे, तो मुल्जिम को अधिक समय तक हिरासत में रखने का अधिकार दे सकता है। यह नियम हमारे संविधान और जाव्ना फौजदारी दोनों में शामिल है, जो सभी लोगों की जिन्दगी और स्वतन्त्रता के आधारभूत अधिकार की महत्ता को दर्शाता है, चाहे वह आदमी देश का नागरिक हो या विदेशी हो ।

जमानत क्या होती है?

किसी भी बन्दी बनाए गए व्यक्ति की आजादी छिन जाती है और वह बन्दी की स्थिति में आ जाता है, जबकि उसे मुकदमे की अवधि के दौरान और अपराध सिद्ध होने तक निर्दोष माना जाना चाहिए। मुकदमा काफी लम्बा चल सकता है, ऐसी स्थिति में उसके परिवार वालों का भी दुःख उठाना पड़ सकता है। यह भी हो सकता है कि उसके आजीविका के साधन-नौकरी, व्यवसाय आदि की हानि हो जाए, ऐसे में उसका परिवार निर्धन, बेघर और बेसहारा हो जाता है।

अगर बन्दी अपने परिवार, इष्ट-मित्रों व वकील से अलग हो जाता है. जो यह बात तय है कि वह अपने बचाव में कुछ नहीं कर पाएगा। इसके अलाक सरकार के राजस्व विभाग को भी उसे जेल में रखने का खर्चा उठाना पड़ सकता है। इन हालातों का दूसरा पक्ष यह भी हो सकता है कि गिरफ्तार कैदी की स्वतन्त्रता (आवाजाही) भी खतरनाक सिद्ध हो सकती है।

वह दूसरे अपराध भी कर सकता है या भाग सकता है। वह केस के प्रमाणों को भी समाप्त कर सकता है और गवाहों को डरा-धमका भी सकता है। वह राजनीतिक दबाव भी बना सकता है और समाज तथा न्याय की हानि कर सकता है।

 

अपराध को जमानत के आधार पर दो भागों में विभाजित कर सकते हैं-

1. जमानतीय प्रकृति के अपराध
2. अजमानतीय प्रकृति के अपराध।

अजमानतीय प्रकृति के अपराध-अजमानतीय प्रकृति के अपराधों में जमानत अधिकार स्वरूप नहीं होती। सी.आर.पी.सी. की धारा 436 के अनुसार-अगर किसी व्यक्ति को पुलिस किसी जमानतीय अपराध के मामले में गिरफ्तार करती है, तो उस व्यक्ति को जमानत पर छोड़ा जा सकता है। अगर कोई जमानत पर छोड़ा गया व्यक्ति जमानत पत्रों की शर्तों के अनुसार न्यायालय में हाजिर नहीं होता है, और जमानत
पत्रों की अन्य शर्तों का भी पालन नहीं करता है, तो कोर्ट उस व्यक्ति को जमानत पर छोड़ने से इन्कार कर सकती है।

अजमानतीय मामलों में जमानत पर छोड़ना कोर्ट की इच्छा और विवेक व साक्ष्य पर निर्भर करता है। मृत्युदण्ड या आजीवन कारावास के दण्ड से दण्डित किए जाने वाले अपराध करने पर कोर्ट सामान्यतः अपराधी की जमानत स्वीकार नहीं करता।

अगर आजीवन कारावास या सजा-ए-मौत मिलने वाला अपराध, किसी कमजोर या दुर्बल व्यक्ति द्वारा या किसी स्त्री द्वारा या 16 साल से कम उम्र के व्यक्ति द्वारा किया जाता है, तो कोर्ट उस व्यक्ति की जमानत स्वीकार कर सकता है। इन मामलों में जमानत लेना या न लेना कोर्ट के विवेक और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।