राष्ट्रपति के अधिकार तथा शक्तियाँ 


राष्ट्रपति की शक्तियाँ दो प्रकार की परिस्थितियों से संबंधित होती हैं: – सामान्य कालीन शक्तियाँ और आपातकालीन शक्तियाँ, सामान्य कालीन शक्तियों को चार भागो में बाटा गया है –

(i) कार्यपालिका शक्तियाँ

(ii) विधायी शक्तियाँ

(ii) वित्तीय शक्तियाँ

(iv) क्षमादान की शक्ति

(i) राष्ट्रपति की कार्यपालिका शक्तियाँ:

राष्ट्रपति राज्य की कार्यपालिका का अध्यक्ष होता है वह प्रधानमंत्रों को नियुक्ति करता है, जो आमतौर पर लोक सभा का नेता होता है और उसकी सलाह पर वह अन्य मंत्रियों का चयन करके, उनके बीच विभागों को बाँटता है. साथ ही उसमें भारतं के रक्षा बलों का सर्वोच्च समादेश निहित होने के कारण उसे युद्ध तथा शांति की घोषणा का भी अधिकार प्राप्त होता है।

राष्ट्रपति सब महत्वपूर्ण नियुक्तियाँ जैसे-प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री की सलाह पर केन्द्र सरकार के अन्य मंत्रियों की नियुक्ति, राज्यों के राज्यपाल, राजदूतों तथा अन्य राजनयिक प्रतिनिधियों, उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश एवं अन्य न्यायाधीश, महान्यायवादी, महालेखा परीक्षक और नियंत्रक, संघ लोक सेवा आयोग आदि जैसे-विभिन्न आयोगों के सदस्यों की भी नियुक्तियाँ करता है। राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त उप-राज्यपाल या मुख्य आयुक्त उसकी ओर से केंद्रशासित प्रदेशों का प्रशासन चलाते हैं। संसद की स्वीकृति से उच्च पदाधिकारियों की सेवाएँ समाप्त करने का अधिकार भी राष्ट्रपति को प्राप्त है।

(ii) राष्ट्रपति की विधायी शक्तियाँ: 

भारत का राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग है अत: उसे निम्नलिखित विधायी शक्तियाँ प्राप्त हैं:

  • – संसद के दोनों सदनों में कुछ सदस्यों को मनोनीत करना।
  • – संसद के प्रत्येक सदन को बुलाना, सदन का संत्रावसान करना तथा वह संसद के प्रत्येक सदन के लिए सदेश भी भेज सकता है।
  • – आवश्यकता होने पर दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाना।
  • – वह लोक सभा को भंग कर सकता है।
  • – वह प्रत्येक आम चुनाव के बाद संसद कोे पहले सत्र का उद्घाटन करता है।
  • – राष्ट्रपति की सहमति के बिना कोई विधेयक, अधिनियम नहीं बन सकता। जब कोई विधेयक दोनों सदनों से पारित हो जाता है, तो उसे राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है। वह अपनी स्वीकृति दे सकता है या विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसद को बापस कर सकता है। यदि विधेयक पुन: उसी रूप में अथवा संशोधित रूप में पारित हो जाता है तो राष्ट्रपति को स्वीकृति देनी पड़ती है।
  • – धन संबंधी विधेयक, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति य संतुष्टि के विना संसद में प्रस्तुत नहीं किए जा सकते और राष्ट्रपति उन पर विशेषाधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता। जब कोई विधेयक राज्य के विधानमंडल से पारित हो जाता है और स्वीकृति के लिएराज्यपाल को भेजा जाता है तो वह उसे राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित कर सकता है। राष्ट्रपति अपनी स्त्रीकृति दे सकता है या नहीं दे सकता है या विधेयक को पुनर्विचार के लिए राज्य सरकार को लौटा सकता है। यदि विधेयक उसी रूप में राज्य के विधानमंडल द्वारा पुनः पारित हो जाता है और यदि राष्ट्रपति उस पर अपनी मंजूरी नहीं देता तो उस विधेयक का वही पर अंत हो जाता है।
  • – राष्ट्रपति संसद के सत्र के न चलते समय, कभी भी अध्यादेश जारी कर सकता है लेकिन संसद की बैठक शुरू होने की तारीख से 6 सप्ताह के अंदर ऐसे अध्यादेश का संसद द्वारा अनुमोदन हो जाना चाहिए।

(ii) राष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियाँ:

राष्ट्रपति को प्राप्त वितीय शक्तियाँ निम्नवत हैं:

– संसद के सामने वार्षिक बजट और महत्वपूर्ण रिपोर्ट रखने की मंजूरी देता है।

– संसद में धन विधेयक रखने की सिफारिश करता है।

– संघ व राज्यों के बीच करों से प्राप्त आय के बंटवारे हेतु वित्त आयोग को नियुक्त करता

– बाढ़, सूखा, युद्ध आदि पर आकस्मिक खर्चां को पूरा करने के लिए संसद द्वारा स्वीकृति तक भारत की आकस्मिक निधि से अग्रिम राशि लेने की मंजूरी भी वे सकता है।

(iv) राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्तिः

राष्ट्रपति किसी व्यक्ति को दी गई सजा को क्षमा कर सकता है, फाँसी रोक सकता है, सजा में विलम्ब या छुट दे सकता है या किसी अपराध के लिए दंडित किसी व्यक्ति को सजा को रद्द या माफ कर सकता है या उसमें कमी कर सकता है। बशर्ते-

क. दण्ड या सजा न्यायालय में दी गई हो।

ख. दण्ड या सजा ऐसे मामले संबंधी कानून को तोड़ने के लिए हो जिस पर संघ सरकार का कार्यपालक अधिकार लागू हो।

ग. ऐसा प्रकरण जिसमें मृत्यु दण्ड दिया गया हो।

राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियाँ

(1) युद्ध, बाह्य या सशस्त्र विद्रोह

  • – अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत जब राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ट हो जाता है कि बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह का संकट सन्निकट है तथा उससे देश की सुरक्षा को गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है, तब वह सारे देश या उसके किसी भाग में आपात स्थिति घोषित कर सकता है।
  • – राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की घोषणा तभी की जा सकेगी, जबकि मंत्रिमंडल लिखित रूप में राष्ट्रपति को ऐसा परामर्श दे।
  • – घोषणा के एक माह के अन्दर संसद के विशेष बहुमत से इसकी स्वीकृति आवश्यक होगी और इसे लागू रखने के लिए प्रत्येक 6 माह बाद स्वीकृति आवश्यक होगी। चूँकि सॉविधान में आपातकाल की कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है अंत: लोक सभा में उपस्थित एवं मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत से ही आपातकाल की घोषणा को समाप्त किया जा सकता है।
  • – आपात स्थिति के अंतर्गत संसद राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार ग्रहण कर लेती है।
  • – राष्ट्रपति संघ और राज्यों के बीच राजस्व के वितरण में भी परिवर्तन कर सकता है। अत: आपातकाल की स्थिति में विभिन्न राज्यों की आतरिक स्वायत्ता निलोबित हो जाती है।
  • – आपातकाल की स्थिति राष्ट्रपति को प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण के मौलिक अधिकार को छोड़कर अन्य मौलिक अधिकारों और उनकी सांविधानिक गारंटियों के परिचालन के निलंबन का अधिकार भी दे सकती है. तब किसी नागरिक को इन अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए न्यायालय में जाने का अधिकार नहीं रहता।

नोट: 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा ” आंतंरिक अशान्ति” के स्थान पर सशस्त्र विद्रोह शब्द जोड़ा गया है। इस प्रकार का पहला आपातकाल 1962 के चीन आक्रमण, दूसरा 1971 के पाकिस्तानी आक्रमण तथा तीसरा 1975 के पाकिस्तानी आक्रमण की वजह से घोषित किया गया था।

(ii ) राष्ट्रपति की राज्य में सांविधानिक तंत्र की विफलता से उत्पन्न आपात स्थिति

 

  • – अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत यदि राष्ट्रपति राज्यपाल के प्रतिवेदन पर इस बात से संतुष्ट हो जाता है कि किसी राज्य की सरकार संविधान के अनुसार नहीं चलाई जा सकती तो वह उस राज्य में आपात स्थिति की घोषणा कर सकता है।
  • – ऐसी आपात स्थिति में राष्ट्रपति संबंधित राज्य की सरकार के किसी एक या सभी कार्यों को
  • या राज्यपाल के किसी भी अधिकार को स्वयं अपने हाथ में ले सकता है।
  • – राष्ट्रपति यह घोषणा कर सकता है कि राज्य की विधायिका के अधिकारों का प्रयोग संसद करेगी, साथ ही संसद अनुमोदन करे तो राष्ट्रपति उस राज्य को संचित निधि में से राज्य द्वारा खर्च को स्वीकृति दे सकता है।
  • – वह राज्य के किसी प्राधिकरण से संबंधित किसी उपबंध को भी निलंबित कर सकता है। पंरतु वह उच्च न्यायालय के किसी भी अधिकार को अपने हाथ में नहीं ले सकता।
  • -वह राज्य की विधायिका को भंग कर सकता है और राज्य की मंत्रि परिषद् को हटा सकता

(iii) राष्ट्रपति की वित्तीय आपात स्थिति

  • – अनुच्छेद 360 के अन्तर्गत यदि राष्ट्रपति संतुष्ट है कि समूचे देश या उसके किसी भाग की वित्तीय स्थिरता या साख के लिए संकट उत्पन्न हो गया है, तो वह वित्तीय आपात स्थिति घोषित कर सकता है।
  • – ऐसी स्थिति में वह किसी राज्य को वित्तीय औचित्य के कुछ सिद्धांतों का पालन करने के लिए कह सकता है।
  • – राष्ट्रपति, उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों सहित केंद्र तथा राज्य सरकारों के अन्तर्गत काम करने वाली सभी श्रेणियों या किसी भी श्रेणी के कर्मचारियों के वेतन तथा भत्तों में कटौती के आदेश दे सकता है।
  • – वह राज्यों के लिए अनिवार्य कर सकता है कि राज्य विधान मंडल में पारित सभी धन विधेयकों को स्वीकृति के लिए उसके सामने रखे।