भारत की कार्यपालिका के दो स्तर हैं:


1. केन्द्रीय स्तर
2. राज्य स्तर


केन्द्रीय कार्यपालिका में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और मंत्रि-परिषद् रहती है तथा मंत्रि परिषद् का प्रमुख, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति की सहायता करता है और उसे परामर्श देता है।

राष्ट्रपति कौन है

भारतीय गणतंत्र का कार्यपालक प्रमुख राष्ट्रपति है। सशस्त्र बलों के सर्वोच्च सेनापतित्व सहित केंद्र सरकार की समस्त कार्यपालक शक्तियाँ, जिसे वह संसद के प्रति उत्तरदायी मंत्रि परिषद् की सलाह पर इस्तेमाल करता है, औपचारिक रूप से उसमें निहित हैं। उसी के नाम पर सारे कार्यपालक कार्य किए जाते हैं।

नोट: संविधान के 42वें संशोधन के अनुसार राष्ट्रपति मंत्रि परिषद् की सलाह मानने को बाध्य है।

राष्ट्रपति पद की योग्यताए

संविधान में राष्ट्रपति के पद पर निर्वाचित होने वाले व्यक्ति के लिए निम्न योग्यताएँ निश्चित की गई हैं-

1.वह भारत का नागरिक हो।
2. वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
3. वह लोक सभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
4. निर्वाचन के समय वह भारत सरकार, किसी राज्य सरकार या इन सरकारों में से किसी के नियंत्रणाधीन किसी स्थानीय स्वायत्त प्राधिकरण के अंतर्गत लाभकारी पद पर न हो।

राष्ट्रपति निर्वाचन की रीति

राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया अनुच्छेद 54 में वर्णित।
निर्वाचन की रीतिअप्रत्यक्ष।
निर्वाचन का कार्यएक निर्वाचक मंडल द्वारा।
निर्वाचक मंडल में सम्मिलित सदस्यसंसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य एवं राज्य विधानसभाओं और संघीय क्षेत्रों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य।
निर्वाचक मंडल में सम्मिलित न होने वाले सदस्यसंसद के दोनों सदनों के मननीत सदस्य एवं राज्य विधानसभाओं और विधान परिषदों के सदस्य।
निर्वाचन की प्रणालीआनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय प्रणाली



मतदान गुप्त मतपत्र द्वारा होता है और चुनाव सफलता प्राप्त करने के लिए उम्मीदवार को ” न्यनतम कोटा” प्राप्त होना आवश्यक होता है। न्यूनतम कोटा निर्धारित करने के लिए निम्न सूत्र अपनाया जाता है:

न्यूनतम कोटा


दिए गए मतों की संख्या ÷ राष्ट्रपति पद हेतु निर्वाचित होने वाले सदस्यों की संख्या + 1  + 1

नोट: न्यूनतम कोटा की व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि स्पष्ट बहुमत प्राप्त होने पर ही एक व्यक्ति को राष्ट्रपति का पद प्राप्त हो सके।

राष्ट्रपति के निर्वाचन में “निर्वाचक मंडल” के प्रत्येक सदस्य के मत का मूल्य समान नहीं होता अत: प्रत्येक सदस्य के मत का मूल्य निम्नलिखित दो सिद्धान्तों के आधार पर निश्चित किया जाता है:


१. किसी भी राज्य या संघीय क्षेत्र की विधानसभा के प्रत्येक सदस्य के मतों की संख्या ( मूल्य) =

राज्य या संघीय क्षेत्री जनसंख्या/राज्य विधानसभा संघीय क्षेत्र की विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों की संख्या ÷ 1000


२. संसद के प्रत्येक सदन के प्रत्येक निर्वाचित सदस्य के मतों की संख्या ( मूल्य)

समस्त राज्यों और संघीय क्षेत्रों की विधानसभाओं के समस्त सदस्यों को = प्राप्त मतों की संख्या का कुल योग ÷ संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों की संख्या


इस प्रकार, राष्ट्रपति के चुनाव में यह ध्यान रखा जाता है कि सभी राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों के मतों के मूल्य का योग संसद के निर्वाचित सदस्यों के मतों के मूल्य के योग के बराबर रहे और सभी राज्य की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के मत मूल्य का निर्धारण करने के लिए एक समान प्रक्रिया अपनाई जाए। इसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व” का सिद्धान्त कहते हैं।